हैहयवंश निर्माण की सार्थकता आज आज़ादी के बाद इतने वर्षों में हम हैहयवंशियो को अपनी समाज की एकता और संगठन बनाने के लिए निरंतर ही संघर्ष करना पड़ रहा है| इसी कड़ी में बहुत से लोगो द्वारा अपने स्तर से लेखनी और कुछ सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से कुछ ना कुछ प्रयास लगातार किया जाता रहा है। हमें इस कार्य में कुछ फलीभूत सफलता भी मिली है जिसमें मेरे द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इलेक्ट्रोनिक इन्टरनेट के माध्यम से पढ़े और आम लोगों तक पहुँचने वाले साहित्यों, इतिहास और कथाओं में अपने इतिहास जीवनी और कथाओं को भारत डिस्कवरी के वेबसाइट पर पहचान बनाया है कुछ रोचक प्रसिद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक वेबसाइट पर भी हमारे समाज के जीवनी, कथाओं, चालीसा और आरती को संकलित किया गया है जिसके माध्यम से ना सिर्फ अपने समाज के लोग बल्कि अन्य समाज के लोग हमें जान और पहचान रहे है और हमारे समाज के बारे में जान रहे है। सामाजिक सहयोग की अवश्यकता है अतः: इस कार्य में इतना सहयोग समाज के लोग अवश्य करें| हमारा समाज के दूसरों लोगों से भी यही निवेदन है की वह भी अधिक से अधिक अपने समाज, हैहयवंशी और सह्स्त्राबहु स...
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सहस्रार्जुन जन्मोत्सव पर विशेष
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सहस्रार्जुन जन्मोत्सव पर विशेष हैहयवंश समाज के बंधुओं युग परिवर्तन ही सामाजिक जीवन का नए परिवेश धारण करने का मंत्र सिखाता है| जिस प्रकार हम प्रकृति के ऋतुओं के परिवर्तन होने पर उसी के अनुरूप वस्त्र आदि धारण कर अपना जीने का जीवन सुगम बनाते है| ठीक उसी प्रकार सामाजिक परिवर्तन की स्थिति भी हमें अपने जीवन जीने के रूप-रंग और ढंग बदलने के लिए प्रेरित करती है| आज अपना हैहयवंश समाज काल के कुचक्र में फँसकर उससे बाहर निकलते हुए नए परिवेश को धारण करने के लिए तत्पर है| अतः: हम सभी समाज जन का यह कर्तव्य बनता है कि हम इस सामाजिक परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार करते हुए, हैहयवंश समाज के नए स्वरूप को ग्रहण करें| जिससे समाज में किसी को किसी प्रकार का कोई भेद-भाव ना किया हो| हम इस प्रकार के समस्त भेद-भाव को शिक्षा, संस्कार और अपने गौरवशाली इतिहास के साथ सुदृढ़ कर आगे बढे| इसके लिए हमें अहम्, वहम, रूढ़ीवादी सोच, और कर्म के प्रकार के भेद को मिटाते हुए अपने स्वभाव और आचरण में बदलाव लाये जाने की जरूरत है, जिससे समाज संगठित और विकसित हो सके| उपरोक्त के लिए हम कुछ छोटे छोटे स्वयं के परिवर्तन जीवन-शैली और...
सामाजिकता और समाज की आवश्यकता
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सामाजिकता और समाज की आवश्यकता जिसको न निजजाती तथा निवेश का अभिमान है, वह नर नहीं, पशु निरा है और मृत्यु सामान है | किसी राष्ट्र या राज्य अर्थात स्थान (समाज) की उन्नति उसके धर्म तथा उस स्थान पर धर्म और संस्कार जो उसके पूर्व में सुचरित्र अवलम्बित है| जिस प्रकार एक लंगड़ा/अंधा व्यक्ति लाठी के सहारे सुदूर पहाड़ पर पहुँचने में समर्थ हो जाता है| उसी प्रकार राष्ट्र / राज्य की जातीय तथा समाज धर्म तथा सदाचार पर उन्नति कर सकती है| वर्तमान में हमारा समाज का अस्तित्व उसके समग्र विकास, समय विकास, क्रांति और जाग्रति का युग है| आज समाज शब्द की आवश्यकता क्यों महत्वपूर्ण है| इस पर विचार किया जाना आवश्यक है| वर्तमान आधुनिक युग और स्वयं के विकास की भागदौड़ और आगे बढ़ने की होड़ में मानव सामाजिक रूप से बिखरता जा रहा है| आज ना तो व्यक्ति को अपने माता पिता, भाई-बहन और अन्य रिश्तेदारों का कोई उसके जीवन में मूल्य रह गया है नहीं वह इन्हें सजोये रखना चाहता है| मानव जन्म लेने के उपरांत ही एकाकी जीवन शुरू किये जाने के संस्कार से संस्कारित और अभिसिंचित होता है| प्रायः यह पाया जाता है की उसका जन्म हॉ...
हैहयवंश के सामाजिक संगठन निर्माण और महत्व
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हैहयवंश के सामाजिक संगठन निर्माण और महत्व किसी भी समाज के निर्माण और संगठन में ब्यक्ति के साथ साथ परिवार की अहम भूमिका होती है| सामाज का निर्माण के बिना ब्यक्ति या परिवार का महत्व नहीं है हम सामाजिक प्राणी के रूप में तभी विकसित हों सकते है जब हमारा समाज हों जो विकसित और संगठित भी हों, जिससे हम सामाजिक सुख-दुख के साथ सामाजिक सांस्कृतिक और रचनात्मक कार्य में पर्तिभाग करते हुए अपने सामाजिक दायित्वो का निर्वहन कर सके| समाज के लिए सामजिक कार्य करना में समय,संयम और सामर्थ्य का होना अनिवार्य है तभी हम सफल रह सकते है| समाज के निर्माण में किसी एक ब्यक्ति या परिवार की भूमिका सहयोग देने की हों सकती है पर जबतक ब्यक्तियो के समूह और परिवारों का मिलन नहीं होगा हम समाज का निर्माण नहीं कर सकते है| अब जब हम विभिन्न ब्यक्ति और परिवार एक समूह मे एकत्र होंगे तो हमारे विचार-सोच और कार्य करने का तरीका कोई जरूरी नही एक हों, ब्यक्ति के विचारों और सोच को हम न तो बदल सकते है पर समूह में बढ़ाते हुए सामाजिक निर्माण के लिए हम कार्य करने के तरीके में सकारात्मक बदलाव ला सकते है जिसमें समू...
राजनीतिक और हैहयवंश
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राजनीतिक और हैहयवंश विगत राजनैतिक परिवेश में हमारें हैहयवंशीय सामाजिक लोगो द्वारा न सिर्फ विभिन्न मीडिया साधनों के माध्यम से देखने को मिला की वह प्रदेश की राजनीती में एक नया अध्याय लिख देंगे| जिसमे समाज के कुछ लोगो द्वारा चुनाव में सहभागिता कर चुनाव लडने का भी फैसला किया पर दुर्भाग्य से सफलता नहीं मिल सकी, किसी भी समाज के प्रगति और विकास के लिए राजनैतिक पकड़ की जरुरत अवश्य ही होती है जिसके बिना हम सरकारी लाभ और हक नहीं प्राप्त कर सकते है, यह सच है परन्तु यह भी सच है की बिना किसी तैयारी और संगठन के स्वरुप और कार्य-क्षमता के कोई भी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है, जिसका परिणाम हमारे सामने है| हमें पहले अपने संगठनात्मक स्वरुप और उसके ढांचे को मजबूत करना होगा| हमें एक ऐसा शशक्त सामाजिक संगठन और स्वरुप का निर्माण करने के साथ उसका शक्ति प्रदर्सन कर समाज को देना होगा की जिससे राजनैतिक दल स्वंम हमें अपनाए और हमारी सहभागिता अपने अपने पार्टी में प्रदान करे| समाज के कुछ लोग चंद लोभ और तवरित लाभ के लिए समाज को राजनीती के तरफ ले तो जा रहे है प...
हैहयवंश का स्वाभिमान
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हैहयवंश का स्वाभिमान कभी – कभी अच्छाईयों और सत्यवादिता के साथ न्याय रूपता व् सामजिक हठ धर्मिता भी विकास में बाधा बन जाते है| अब हम इसे विधि का विधान या फिर सामजिक युग परिवर्तन ! संसार जो भी प्राणी या प्राणी के रूप स्वंम भगवान ने ही अवतार लिया सभी का निश्चित समय और दिन है कि उसे मिटना या संसार से जाना ही है क्योकि जो आया है उसे जाना है जो बना या बनाया गया है उसे मिटना या खत्म होना है जो आज है कल नहीं था और जो आज है भी उसे कल नहीं रहना है| परन्तु यह भी सत्य है की कुछ मूल चीजे होती है जिसका केवल स्वरुप ही बदलता है उसके कार्य और निरंतरता बनी रहती है जैसे कि जल, हवा और जीवन जिसे हम सर्वशक्तिमान कहते है| जिस प्रकार सत्य को हम नहीं मिटा सकते है चाहे उसे कितना भी छिपाया या झुठलाया जाय पर एक ना एक दिन सच सामने आ जाती ह| समय परिवर्तनसील है इसी कारण युग परिवर्तन हुआ और सतयुगस से कलयुग तक का युग निर्माण बना| परिवर्तन संसार का नियम है, इसी कारण ऋतुये बनी और उसी अनुसार मौसम का परिवर्तन होता है और हमें प्राकृतिक रूप में सभी चीजे प्...
हैहयवंश समाज को आज क्ष से क्षत्रिय के पहचान की जरुरत
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हैहयवंश समाज को आज क्ष से क्षत्रिय के पहचान की जरुरत हैहयवंश समाज के कुछ कर्मठ और आशावान सामाजिक बंधुऔ के द्वारा समाज को आज से लगभग २५-३० वर्षों से किये जा रहे समाज में सुधार और उसके प्रचार-प्रसार जिससे हमारा समाज एक सुद्रिड सामाजिक संगठन का स्वरुप बन सके और हमारा भी समाज अपनी प्रतिष्ठा अनुसार आगे बढ़ सके| जिसका परिणाम है कि हम सभी के प्रयास और कार्य से अपना हैहयवंश क्षत्रिय समाज एक ऐसे जगह मुकाम बनाते हुए खडा हो चुका है जिसके स्वरुप में ज़रा सी लापरवाही या सामाजिक छेड़-छाड़ से वर्षों की तपस्या और सपना बिखर सकता है | जिसका एक बड़ा कारण आज के सामाजिक ताने – बाने में कुछ लोगो के हस्तक्षेप किया जाना है| समाज के कुछ लोगो के द्वारा ब्याग्तिगत लाभार्थ और स्वार्थ के कारण किये जा रहे कार्य जिसके कारण हमारा सामाजिक संगठन फिर से कही अर्श से फर्श पर ना आ जाय|...